Wednesday, 1 November 2017

चाणक्य नीति के अनुसार पिता के संतान के प्रति कर्तव्य

संतान के विकास में माता के साथ पिता का भी बहुत योगदान होता है.माता मुख्यतः संतान को केवल प्रेम करती है परन्तु प्रेम के साथ-साथ डांट भी संतान के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है जो माता के वश की बात नहीं है.चाणक्य नीति के निम्न दोहे में पिता के संतान के प्रति कर्तव्यों के बारे में बताया गया है:
लालयेत पंचवर्षानी दश वर्षानी ताडयेत,
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत.
उपरोक्त दोहे के अनुसार पिता व संतान के रिश्ते को मुख्यतः तीन भागों में संतान की आयु के अनुसार वर्णित किया गया है .प्रथम भाग में 6 वर्ष की आयु तक संतान के प्रति पिता के कर्तव्य बताए गए हैं व द्वितीय भाग में 6 से 15 वर्ष तक पिता व संतान के रिश्ते के बारे में व तृतीय भाग में बताया गया है कि 16 वर्ष के बाद पिता को संतान से किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए . दोहे में कही गई बात को निम्न बिन्दुओं में समझाया गया है:
1.संतान के प्रति पिता का कर्त्तव्य है कि वह बच्चे की पांच वर्ष की उम्र तक उसे लाड़-प्यार से रखे .
2.पिता का संतान के प्रति कर्त्तव्य है कि वह 6 से 15 वर्ष की उम्र तक उनकी ताड़ना करे व लाड़ प्यार न करे क्योंकि यही उम्र पढ़ने-लिखने की,सीखने की,चरित्र निर्माण की व अच्छी प्रवृतियों को अपनाने की होती है.इन सब में पिता एक महत्वपूर्ण योगदान निभा सकता है .यह वह समय होता है जब भावी जीवन की नींव तैयार होती है अत: पिता इस अवधि में लाड़-प्यार न देकर उसे इस प्रकार प्रेरित करे कि संतान अपना कर्तव्य समझ सके.
3.पिता को संतान की 16 वर्ष की आयु के पश्चात मित्रवत व्यवहार करना चाहिए व उसको ताड़ना व डांट-फटकार नहीं करनी चाहिए.यदि संतान की डांट फटकार इस आयु में की जायेगी तो संतान बागी हो सकती है व घर छोड़कर जा सकती है.इस उम्र में पिता को संतान के विचारों को भी महत्व देना चाहिए व अपना निर्णय संतान पर नहीं थोपना चाहिए.एक मित्र की तरह पिता को अपनी सलाह संतान को देनी चाहिए ताकि संतान जीवन में आने वाली कठिनाईओं का सामना कर सके.

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